जीवन सन्दर्भ
ग़ज़ल दर्द उतरा है सरेशाम मेरी बस्ती में ,अपने ही कर रहे हैं छेद अपनी कश्ती में ,उम्र पर पाबंदियां ढीली हुई हैं आज तो ,वक़्त की रंगीनियों मे लोग सारे मस्ती में ,जल रहा है देश तो क्या अपना घर महफूज है ,जोश है पर होश का क्या ,बचा कुछ क्या हस्ती में...
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डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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[12 Feb 2010 10:33 AM]



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