कुनबा
बाल कटाकर शीशा देखूं आंखों में आ पिता झांकते बाल बढ़ा लेता हूं जब दाढ़ी में नाना मुस्काते हैं कमीज हो या कुर्ता पहना पीठ से भैया जाते लगते हैं नाक पर गुस्सा आवे लौंग का चटख लश्कारा अम्मा का चटनी का चटखारा दादी का पोपले मुंह का हासा नानी का घिस घिस कर पति...
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anup
कविता
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[24 Feb 2010 04:26 AM]



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