उत्तरा की मांग -2
पिछले का शेष .....और विदा पाकर अभिमन्यु तीर की भांति चला युद्ध क्षेत्र में |'सप्य्क सप्य्क क्लाक ' तलवार चल रही थी जैसे मछली पानी में क्रीडा कर रही हों | सधे हुए हाथो से छूटे हुए ब्रह्मास्त्र की भांति वह टूट पड़ता था और जिस पर टूटता था उसके जीवन और...
[पूरी पोस्ट]
Ratan Singh Shekhawat
स्व.श्री तनसिंहजी की कलम से
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[10 Feb 2010 19:25 PM]



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