जो जीवन में उतारा ही न गया तो वो कैसा धर्म ? (हम भी अंधों के शहर में चश्मों के खरीदार ढूंढने निकले हैं)
अक्सर हम यही देखते हैं कि जब हम किसी अन्ध मान्यता, अन्ध भावावेश अथवा बौद्धिक तर्कजाल को धर्म मानने की भूल करने लगते हैं तो उसमें कहीं अधिक बुरी तरह से उलझ जाते हैं। हम जिस जाति, जिस कुल, परिवार में जन्मे हैं, जिस परिवेश में पले हैं, उस वंश परम्परा की...
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पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
दुकानदारी
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[06 Mar 2010 05:01 AM]



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