पता नहीं मन की ये दुविधा कब पीछा छोडेगी
मालूम नहीं क्यों, कभी कभी तो ऎसा लगने लगता है कि ये ब्लागिंग,फ्लागिंग कुछ नहीं--सब फालतू की टन्टेबाजी है--ऎसा लगता है कि अपनी कोई खुशी, कोई दुख, कोई जानकारी, मन में आया जरा सा कोई विचार अपने तक ही सीमित न रख पाना और उसे झट से एक पोस्ट के जरिये ठेल देना...
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पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
बस यूँ ही
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[25 Feb 2010 08:05 AM]



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