गज़ल
इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उन का बहुत बहुत धन्यवाद ।गज़ल ज़ख़्मी हैं चाहतें, खार सी ज़िन्दगीक्यों लगे मुझको दुश्वार सी ज़िन्दगीलाल रुखसार पर प्यारा सा काला तिलऔर है प्यारी गुलनार सी ज़िन्दगीसांवला चेहरा मुस्कराते हैं...
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निर्मला कपिला
ग़ज़ल
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[15 Feb 2010 05:03 AM]



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