कविता पँखनुचा
कविता--- पंखनुचाउसके अहं में छिपा विषउसकी मैं में,तू की अवहेलना,शोषण की बुभुक्शा,कामुक्ता कि लिप्सा,अभिमान की पिपासा,कर देती है आहततर्पिणी का अनुराग,सहनशीलता,सहिश्णुता,त्यागपंखनुचा की आहों सेसिसकता हैघर की दिवारों काहर कणक्योंकीउन दिवारों नेघुटते देखा...
[पूरी पोस्ट]
निर्मला कपिला
गीत
16
0
0
0
0
[19 Feb 2010 21:40 PM]



Shuffle








