गज़ल कविता नज़्म
इसे गज़ल कविता नज्म कुछ भी कह लीजिये बस मेरा मन्तव आज के ज्वलन्त मुद्दे पर कुछ कहने का है। आज कल टी वी पर आप देख रहे हैं इन साधू सन्तों की करतूतें अभी पता नही और कितने भेडिये साधुयों की खाल मे छुपे बैठे हैं हम केवल अपनी आस्था के चलते आस्तीन मे साँ पाल रहे...
[पूरी पोस्ट]
निर्मला कपिला
गज़ल
4
0
0
0
0
[04 Mar 2010 22:19 PM]



Shuffle








