तुम्हारे....मेरे लिए....
नींद मयस्सर नहीं अब मुझे...रात होती है... क्योंकि ये रात की मजबूरी है... वर्ना यूंही जागकर सोना....एक आदत सी बन चुकी है...ज़िंदगी बिताना भी...बस अब एक आदत सी है... जिंदगी के हर दोराहे पर.. कश्मकश पर...फलसफे पर.....गिरती-पड़ती.....दौड़ती-हांफती......कई...
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tanu sharma.joshi
तुम...
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[20 Feb 2010 01:06 AM]



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