केसरिया मन

आर्जव सोचता हूं सो जाऊं !खो जाऊं !बोझिल तन !स्नेहिल मन !निढाल सब छोड़ू !मिट जाऊं !लेकिन फिर ……….सांझ थोड़ी देर तक कीतुम्हारी संगति याद आती है -------तुम्हारे सानिध्य का केसरअभी तकमन की देह पर बिखरा हुआ है !तुम्हारे सरल मधुर हास का चन्दनअभी भी झींना झींनाआती जाती... [पूरी पोस्ट]
writer Aarjav

कविता

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[24 Feb 2010 14:41 PM]

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