प्रेम दीक्षा
शिशिर !न मालूम थामुझे किदिन दिनपल पलरव रवतुम्हारे दुलार केसान्द्र सोम मेंछका हैपगा हैडूबा ,उतराया है !यह आम्र वृक्ष !न मालूम थामुझे किस्नेहातुर लजीलेतुम्हीं नेफैलाकर बहुत बारगाढ़े शुभ्र कोहरेकी यवनिकाइस तृषित ढीठआम्र वृक्ष सेबहुत देर तक की हैएकान्तिक...
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Aarjav
कविता
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[06 Mar 2010 16:14 PM]



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