अनार कली कहां चली.....
भाई ना तो हम कवि है, ओर ना ही शायर, लेकिन इन सात दिनो मै इतने शेर पढे, ओर इतनी बाते पढी की मजा आ गया...जब हम रोहतक जा रहे थे तो जेसे जेसे ट्रको पर, ट्रालियो पर स्कुटरो पर ओर रिक्क्षा पर नजर पडती तो कुछ ना कुछ पढने को मिल जाता ओर सफ़र भी जल्द ही खत्म भी हो...
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राज भाटिय़ा
एक आप बीती
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[19 Feb 2010 12:17 PM]



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