दिन बीता और शाम हो गई

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai दिन बीता और शाम हो गई ।आफ़त एक तमाम हो गई ।मै'अ कुछ यूँ दी उसने हमकोपीनी हमें हराम हो गई ।जो ख़ुद से भी नहीं कही थीवे सब बातें आम हो गई ।घोड़ा जितना ज़्यादा दौड़ाउतनी सख्त लगाम हो गई ।'मुक्त' हुआ व्यापार इस कदरसारी सोच गुलाम हो गई ।जो भी दुःख-दंडकवन... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai

book - begane mausam

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[24 Feb 2010 01:02 AM]

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