दिन बीता और शाम हो गई
दिन बीता और शाम हो गई ।आफ़त एक तमाम हो गई ।मै'अ कुछ यूँ दी उसने हमकोपीनी हमें हराम हो गई ।जो ख़ुद से भी नहीं कही थीवे सब बातें आम हो गई ।घोड़ा जितना ज़्यादा दौड़ाउतनी सख्त लगाम हो गई ।'मुक्त' हुआ व्यापार इस कदरसारी सोच गुलाम हो गई ।जो भी दुःख-दंडकवन...
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joshi kavirai
book - begane mausam
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[24 Feb 2010 01:02 AM]



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