प्रेम कि नैया है राम के भरोसे

ख्वाहिशें ऐसी तपती धूप के बाद हवाओं के साथ तैरते बादल पहाड़ पर टिक जाते हैं। आंखें अभिभूत होती हैं। टिप टिप सी बूंदें बदन को छूती हैं। रोम रोम में सिहरन होती है। बादलों की गरज से कानों में संगीत बजने लगता है। बूंदें तेज होती हैं तो जीभ अनायास बाहर निकलती है। एक बूंद... [पूरी पोस्ट]
writer ramkumar singh
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[15 Feb 2010 07:24 AM]

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