दुख पालने वाली लड़की
रुलाई धुलाई छोड़कर इधर थोड़ा बैठोएक एक कर खोलो दुख की पोटली..दिखाओ अपने छुपाए हुए जख्मों कोकितने दिनों मे ये कितने गहरे हुएऐ लड़की सुन रही हो!बाहर जरा फैला दो यह सबदुख तुम्हारे बिल्कुल भीग गए हैंहवा में होती है एक विलक्षण खासियतकुछ दुखों को उड़ा देती है...
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संदीप पाण्डेय
कविता
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[07 Mar 2010 00:02 AM]



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