तब ’नारी’ हो जाउँगी..
मुक्ति पर इतना विवाद, खुलेपन पर इतना हंगामा क्यों ? युग बीते, परक्या तुम्हारी लोभ से ललचायी आँखों से पूर्व-राग का नशा नहीं उतरा ? शाश्वत कुंठा या कायरताहो गयी न अभिव्यक्त !संस्कार दुबक गयाशिक्षा का, समाज काजग गई न निसर्ग की सोई भूखहो...
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हिमांशु । Himanshu
कविता
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[07 Mar 2010 23:20 PM]



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