मौसम पे जब भी छलक के गिरता है प्यार !

मौन के खाली घर मे-                                       ओम आर्य मै तुम्हें कितना कम प्यार देता हूँऔर उतने से हीं तुम कितना ज्यादा भर जाती होऐसा नहीं है कितुम्हारी धारिता कम हैया इच्छापर जितना ख्वाब के भीतर रहकरदिया जा सकता है प्यारउतना मुश्किल होता है देनाख्वाब के बाहर रहते हुए, मेरे लिए और शायद किसी के लिए भी,तुम... [पूरी पोस्ट]
writer ओम आर्य

कोख

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[05 Mar 2010 00:26 AM]

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