एक रिक्त अहसास!
हाँमैं नारी हूँ,वन्दनीय औ' पूजिताकहते रहे हैं लोग,कितने जीवन जिए हैं मैंनेकहाँ तो सप्तरिशी की पंक्ति मेंविराजी गई,सतियों की उपमा देपूजी गई।मर्यादाओं में भी भारीपड़ रही थी,तब जागा पुरूष अंहकारउसको परदे में बंद कर दिया,सीमाओं में बाँध दियाचारदीवारी से...
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रेखा श्रीवास्तव
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[19 Feb 2010 06:12 AM]



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