ये ज़िरह को तोलता
अभाव भी है बोलतादिलों के भेद खोलतातड़प कसक के साथ हीआँखों में है डोलताधरती के सीने मेंये ज़िरह को तोलतासमेटना था नभ कोये गिरह को खोलतापा लेते जो मुक्कमिल जहाँतो कौन क़दमों में जान डालताशोर भी इसी का हैहै बाँध सारे तोड़तासात पर्दों में रखा हुआअस्तित्व को...
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शारदा अरोरा
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[08 Mar 2010 01:23 AM]



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