पगडंडी वापस नहीं लौटती

Hamzabaan हमज़बान  ख़ालिद ए ख़ान की क़लम से पहले की  तरह धुंधली आँखों से बस देखती रहती है गाँव की सीमा से लगती बडी सड़क की ओर  अब   पगडंडी वापस नहीं लौटतीचौपाल में फैला हुआ है मरघट सा सन्नाटा शाम को बैठे रहते है कुछ पुरनिया हुक्के के साथ अपनी... [पूरी पोस्ट]
writer शहरोज़

कविता

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[04 Mar 2010 02:45 AM]

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