पशोपेश में पड़ा हुआ हूँ

स्वप्नलोक मैं सपनों की बात सुनूँ, या जनमत का सम्मान करूँ ।पशोपेश में पड़ा हुआ हूँ, काम क्या करूँ क्या न करूँ ॥उम्र गुजरती जाती है, पर मंजिल अब तक नहीं मिली ।बाँछें बहुत खिलीं-मुरझायीं, लेकिन मेरी नहीं खिलीं ॥शुभचिन्तक उकसाते हैं, पर आस टूटती जाती है ।जनमत साथ न... [पूरी पोस्ट]
writer विवेक सिंह
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[03 Mar 2010 20:47 PM]

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