होलियाए दोहे

मनोरमा होली तो अब सामने खेलेंगे सब रंग।मँहगाई ऐसी बढ़ी फीका हुआ उमंग।।पैसा निकले हाथ से ज्यों मुट्ठी से रेत।रंग दिखे ना आस की सूखे हैं सब खेत।।एक रंग आतंक का दूजा भ्रष्टाचार।सभी सुरक्षा संग ले चलती है सरकार।।मौसम और इन्सान का बदला खूब स्वभाव।है वसंत पतझड़ भरा... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[26 Feb 2010 10:28 AM]

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