फगुनाहट

मनोरमा देखो फिर से वसंती हवा आ गयी। तान कोयल की कानों में यूँ छा गयी। कामिनी मिल खोजेंगे रंगीनियाँ।। इस कदर डूबी क्यों बाहरी रंग में। रंग फागुन का गहरा पिया संग मे। हो छटा फागुनी और घटा जुल्फ की, है मिलन की तड़प मेरे अंग अंग में। दामिनी कुछ कर देंगे नादानियाँ।।... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[27 Feb 2010 20:52 PM]

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