मीडिया को कठघरे में रखती एक कविता, गौर कीजिए...
बंधु....जो हालत और हालात देश के हैं, वैसे में अक्सर हम जैसे बहुत कुछ कहना-लिखना चाहते हैं। लेकिन कभी चंद लाइने हमारे बहुत-कुछ कहे या लिखे से आगे की बात कह जाती हैं। कभी मेरी सहयोगी रही ऋचा साकले ने मुझे यह कविता भेजी...तो मुझे लगा यह तो हम सभी को पढ़नी...
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Punya Prasun Bajpai
कविता
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[05 Mar 2010 00:36 AM]



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