प्रेम-चतुर्दशी पर अपनी कुछ प्रेमिकाओं की याद में
उम्र का ये पड़ाव बड़ा ही विचित्र-सा है। ये वो पड़ाव है जब "बड़प्पन" की तलाश में भटकती उम्र को अचानक से उस्ताद की ऐसी झिड़की पड़ती है कि कमबख्त बगलें झांकने लगती है अपनी...और इसी पड़ाव पर अपने "लड़कपन" को बचाये रखने की मुहिम में यही बिचारी उम्र इन दर्पणों,...
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गौतम राजरिशी
एक ब्लौगर की डायरी से...
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[17 Feb 2010 11:42 AM]



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