कुछ रंग अनदेखे-से...
होली की खुमारी चेहरे पे लगे रंगों के गीलेपन के साथ ही धीरे-धीरे सूखती हुई...उतरती हुई। रंगों की ये धमाचौकड़ी पूरे मौसम को ताजगी देती हुई-सी, जिसकी आगे आने वाले पतझड़ के वास्ते डटे रहने के लिये दरकार है। हर रंग अपनी कहानी कहता हुआ...और ऐसे में अचानक से मुझे...
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गौतम राजरिशी
एक ब्लौगर की डायरी से...
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[02 Mar 2010 02:25 AM]



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