तू मेरे गोकुल का कान्हा...
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गईहोंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई राधा कुंज भवन में जैसे सीता खड़ी हुई उपवन में खड़ी हुई थी सदियों से मैं थाल सजाकर मन-आंगन में जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई होंठ हिले तक...
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फ़िरदौस ख़ान
गीत
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[02 Mar 2010 03:52 AM]



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