कमाल है ....( गज़ल )

मैं समय हूँ ... सारा तो काम हमने संभाला कमाल है फ़िर भी तुम्हारे हाथ मे छाला कमाल है मुद्दत से जो चिराग जले ही नहीं कभी वो कह रहे हैं खुद को उजाला कमाल है लाजमी था आज तो मुंह खोलना मगर सबकी जुबां पे आज भी ताला कमाल हैभरता है जो किसान जमाने के पेट को मिलता नहीं है उसको... [पूरी पोस्ट]
writer डा. उदय ’ मणि ’
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[23 Feb 2010 13:41 PM]

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