मेरी आफरीन - तेरे ही नाम मेरी सुबह औ' मेरी शाम

Kuchh kahi kuchh unkahi तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।खुदा को देखा नहीं है कभी हमने पर,तुम में ही हम खुदा की झलक पाते हैं।तुम ही मेरी सुबह हो शाम भी तुम हो,तुम्हारी ही चांदनी में हम रातों को नहाते हैं।गीत लिखते हैं तो बस तेरी ही खातिर... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[21 Feb 2010 06:15 AM]

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