जादू सा छा रहा है,कोई मुझमे समा रहा है
जादू सा छा रहा है ,कोई मुझमे समा रहा है।जुल्फों में कैद बादलों को, सावन बना रहा है।चलने से उसके हर शू , आ जाती है बहारें,मरुभूमि में भी चल कर,मौसम बदल रहा है।पलकें उठा के अपनी, देखो ले आता है सहर वो पलकें गिरा ली उसने तो, बस तारीक छा रहा है।आवाज़ है उसकी...
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Nihar Khan
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[23 Feb 2010 11:40 AM]



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