एक सन्नाटा पसरा हुआ

Kuchh kahi kuchh unkahi सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ - तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,दिन भर की थकन हवा में गुम हो जाती है ,बाल उड़ उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं,आंसू आँख से निकल बस भाप हो उड़ जाते हैं,कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।पर , मेरे हाथ ज्यूँही... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[24 Feb 2010 11:44 AM]

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