जीवन एक भार,मन की व्यथा एवं दर्द का सागर
यह जीवन है एक भार प्रिये! थी तृषा जगी मन में मेरे पर प्यास कहाँ बुझ पाती है, जल की चाहत में भटक रहा, मन पाता है अंगार प्रिये।यह जीवन है एक भार प्रिये! जो दूर कहकशां सा दीखा, तो मन मयूर सा नाच उठा, पर पास जो जाकर देखा तो पाया मरू का सा सार प्रिये।यह जीवन...
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Nihar Khan
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[25 Feb 2010 20:46 PM]



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