खुलता हूँ तो किताब हो जाता हूँ,पन्नो पे बिखरा गुलाब हो जाता हूँ.

Kuchh kahi kuchh unkahi देखो सुरमई सांझ उतर आयी है,लगता है आपने अपनी जुल्फें लहराई है।मंदिर में बजी जो घंटियों की तरह,सुना है बस आपने पाजेब छनकाई है।सात सुरों की महफ़िल सजा के बैठे हैं,लोग कहते हैं की वो खिलखिलाई है।चेहरे से उसने अपनी जुल्फों को हटाया,चांदनी धीरे से धरती पे उतर... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[01 Mar 2010 09:52 AM]

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