मुमकिन हो तो मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइए

Kuchh kahi kuchh unkahi मुमकिन हो तो सिर्फ मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइये,अपनी पलकों का वरक उठाइये और मेरी सुबह लाइये।मैं समंदर में भटक रहा हूँ एक किश्ती की तरह ऐ दोस्त,मुझको मौजों से बचा कर आप किनारे तक तो ले आइये।तरस गया है ज़माना देखने को एक चौदहवीं का चाँद,उनकी खातिर ही सही... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[03 Mar 2010 11:10 AM]

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