है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद

Kuchh kahi kuchh unkahi है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद,मन के भीतर मच गया है एक द्वन्द । वो मेरा जो कुछ भी नहीं तो ऐ दोस्त, याद उसकी आ आ के क्यूँ करती है तंग।जब भी मैं खींचता हूँ लकीर कागज़ पे,वो हो जाती है पूर्णतया उसमें जीवंत।लिखता हूँ उसको ख़त जब अपने हाल का,पढ़ के वो... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[05 Mar 2010 00:12 AM]

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