मंदिर

उधेड़-बुन मैं जब भी कभी मंदिर जाता हूँभगवान को वैसे का वैसा ही तटस्थ पाता हूँकर्मयोगी जो ठहरे!वही मुद्रावही भाव-भंगिमावही अधरो पे मुरलीऔरसाथ में वही राधाजो कृष्ण को छोड़मुझे देख रही हैंजो किअसम्भवअकल्पितऔरअसत्य हैइन्हीं सब बातों को ले करमैं हो जाता हूँ उनसे विमुखन... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[02 Mar 2010 16:49 PM]

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