क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़
पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भरसड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना होजला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़ ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से...
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श्रद्धा जैन
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[11 Feb 2010 07:50 AM]



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