ग़ज़ल

अनुरक्ति घातों में कुछ नहीं मगर हाँ बातों में कुछ तो दम है ! अंधों को भी बेच दिया है मैंने सुरमा क्या कम है !! तुम्हें भले संसार दिखाई पड़ता हो केवल सपना ! लेकिन मुझको तो लगता है जुल्फों में अब भी ख़म है !! यूँ ही नहीं गँवाई हमने जान बेवजह पंडित जी ! खंज़र उसके... [पूरी पोस्ट]
writer ललितमोहन त्रिवेदी

ग़ज़ल

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[21 Feb 2010 08:29 AM]

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