मेरा दीन भी तू ,ईमान भी तू
राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई से आगे ...पैरों की कंकड़ी निकालती ,झाड़ियों का सहारा लेती जब मैं पहाड़ की चोटी के करीब पहुँच गयी तो ऊपर से आती चिरागों की रोशनी ने जैसे मेरा हाथ थाम लिया मैंने उसका सहारा लेते हुए छोटी पर कदम रखा तो सामने वही...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[23 Feb 2010 02:28 AM]



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