स्त्री का सच
स्त्री सुहाती हैंकबजबनयनो कोझुका करओठ को दबा करइठलाती हैंरति बन जाती हैंयाआँखों मे आंसूंझुकी हुई गर्दनसहनशीलता कि प्रतिमाबन जीती जाती हैंजिन्दगी शांति से चलती रहेचाहे स्त्री उसमे कितनी भीतपती रहेसच बोलने सेहर स्त्री कोमना किया जाता हैंऔर...
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[21 Feb 2010 08:08 AM]



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