नारी का एक और सच !
जीवन समर्पित किया बचपन से बुढ़ापे तक बेटी बनी,
एक गर्भ से,
एक घर में, जन्म लेकर पली बढ़ी सब कुछ किया.
पर कही पराया धन ही गयी.
बेटा सब कुछ पा गया
उसको कहा--
ऐसा 'अपने घर ' जाकर करना ये मेरे वश में नहीं.
पराया धन
अपनी समझ से
सब कुछ देकर विदा किया
जिनकी अमानत...
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रेखा श्रीवास्तव
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[22 Feb 2010 03:00 AM]



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