सैमसंग पुरस्कार : बंद करो विरोध की यह नौटंकी
जो सज्जन हर वक्त इस खुशफहमी में रहते हैं कि हिंदी का लेखक बेबसी और बेचारगी में ही जीता या रहता है, उनसे मेरी विनम्र गुजारिश है कि वे अपनी खुशफहमी के इंद्रजाल से जरा बाहर निकलें और इस हकीकत को स्वीकार करें कि हिंदी का लेखक बेहद मजे और चैन से अपनी जिंदगी...
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अंशुमाली रस्तोगी
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[15 Feb 2010 00:24 AM]



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