लिपस्टिक की लेडीफिंगर समझने की मुश्किल!
आम आदमी और आम बजट की शायद यही नियति है। हमेशा उम्मीद की जाती है कि शायद अब ये संघर्ष कर खुद को ख़ास बना लें, लेकिन नहीं। बजट और आदमी ने खुद के आम होने को स्वीकार कर लिया है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इतनी बार छले जाने के बावजूद आम आदमी ने बजट से फिर...
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नीरज बधवार
(हास्य-व्यंग्य)
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[06 Mar 2010 01:08 AM]



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