होती ही क्यूँ हैं अपेक्षाएँ?
[श्री प्रकाश गोविंद जी की बनाई पेंटिंग साभार]हाल ही में प्रेम दिवस पर श्री शरद कोकस जी की एक कविता पढ़ी-उसके इस एक अंश से न जाने कितने विचार मन में उठने लगे.बरसों बाद भीखत्म नहीं होती अपेक्षाएँशुभकामनाओं की तरह अल्पजीवी नहीं होती अपेक्षाएँपलती रहती हैंसमय...
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अल्पना वर्मा
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[19 Feb 2010 03:09 AM]



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