क्या लौटेगा वसंत
नदी किनारे, घास पर पग सहलाता, बौद्ध मंदिर को स्वयं में समाए टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर डोलता-सा रायन, अपने स्वच्छंद चेहरे पर धूप का ताप लिए, मेरी ओर ही चला आ रहा था। अपने गेरुए चोंगे में, सर मुँडाए, रायन मुझे सदा से किसी ऐतिहासिक बौद्ध भिक्षु की भाँति ही...
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swati
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[16 Feb 2010 23:46 PM]



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