दहशत : हरीशचन्द्र पाण्डे की एक कविता

अनुनाद दहशतपारे सी चमक रही है वहमुस्कुराते हुए होंठों के उस हलके दबे कोर को देखोजहाँ से रिस रही है दहशतएक दृश्य - अपने अपने भीतर बनते बंकरों काएक ध्वनि - फूलों के चटाचट टूटने कीएक कल्पना - सारे आपराधिक उपन्यासों के पात्रजीवित हो गए हैंबहिष्कृत स्मृतियाँ लौटी... [पूरी पोस्ट]
writer भारत भूषण तिवारी

श्रेष्ठ हिंदी कविता

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[28 Feb 2010 06:46 AM]

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