भांग, मालपुआ, और होलियाते हम .....अमा कभी तो बुरा मानो
जब से इस बेकार से शहर में आकर बस जाने टाईप की मजबूरी हो गई तभी से सारे त्यौहारों के मायने ही बदल गए हैं ,न मुई ये होली रंगीन लगती है न ही दिवाली की चमक बरकरार है । कहने को तो सब कुछ हो ही रहा होगा मगर हम का करें कि ई ससुर दिल जो बिहारी रह गया है । ऊपर से...
[पूरी पोस्ट]
अजय कुमार झा
9
0
0
0
0
[28 Feb 2010 10:00 AM]



Shuffle








