रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ.. नूरजहां की काँपती आवाज़ में मचल पड़ी ग़ालिब की ये गज़ल

आवाज़ महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७३लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और, तनहा गये क्यों अब रहो तनहा कोई दिन और। ग़ालिब की ज़िंदगी बड़ी हीं तकलीफ़ में गुजरी और इस तकलीफ़ का कारण महज़ आर्थिक नहीं था। हाँ आर्थिक भी कई कारण थे, जिनका ज़िक्र हम आगे की कड़ियों में करेंगे। आज... [पूरी पोस्ट]
writer विश्व दीपक

yaas yagana changezi

views
5
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[02 Mar 2010 23:15 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix