होली 2010
हरिद्वारी दोहे आसमान के गाल पर मलती धरा गुलाल, धरा गगन दोनों हुए होली खेल निहाल ।। आसमान खूलकर हंसा, धरती हुई निहाल। जब धरती के गाल पर नभ ने मला गुलाल।। सतरंगी चूनर हुई बहुरंगी सब अंग, हर मन में बजने लगे ढोलक और म़ृदंग ।। ऐसी भंग छकी...
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डॉ. कमलकांत बुधकर
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[01 Mar 2010 09:53 AM]



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