'न हो कोई पहचान' और एक पहेली
आज कुछ नहीं , बस्स , बाबा बुल्ले शाह की एक पंक्ति और इस अकिंचन द्वारा किया गया उसका अनुवाद : चल वे बुल्लेया ! चल ओत्थे चल्लिए , जित्थे सारे आन्ने ! ना कोई साड्डी जात पिछाने , ते ना कोई सानू मान्ने ! *******चलो बुल्ला ! चलो वहाँ चलें जहाँ है अन्धों का...
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sidheshwer
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[16 Feb 2010 10:16 AM]



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